Monday, 26 January 2015

संविधान सभा का काम औपचारिक रूप से समाप्त करने के बाद डॉ. आम्बेड़कर द्वारा दिए भाषण के अंश /Dr.Ambedkar`speech at the end of formal ending of savidhan sabha

खून की आखिरी बूंद तक आजादी  की रक्षा करनी है

महोदय,
            26 जनवरी 1950 को भारत एक स्वतंत्र गणतंत्र होगा। उसकी स्वतंत्रता का क्या भविष्य होगा ?  क्या वह अपनी स्वतंत्रता बनाये रखेगा या खो देगा।  यह बात नहीं कि भारत कभी स्वतंत्र देश नहीं था , लेकिन उसने उसे  दिया था। क्या वह उसे दूसरी बार खो देगा ?  यह विचार मुझे भविष्य  को लेकर बहुत चिंचित कर देता है।  यह तथ्य मुझे और भी व्यथित  करता है कि  अपने ही कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण भारत ने अपनी  स्वतंत्रता खोई।  सिंध पर मोहम्मद बिन कासिम के  हमले में राजा हादिर के सैन्य अधिकारियो  ने कासिम के दलालो से रिश्वत लेकर अपने राजा के लिए लड़ने से इन्कार कर दिया था।  जयचंद ने मोहम्मंद गोरी को पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ लड़ने के लिए आमंत्रित किया।  शिवजी के कई मराठा सरदार व राजपूत राजा मुगलों की ओर से लड़ रहे थे।    
क्या इतिहास दोहराएगा ? यह विचार मुझे मुझे चिंता से भर देता है।  यह चिंता तब और  गहरी हो जाती है कि जाति और धर्म रूप में हमारे पुराने सत्रुओं के अतिरिक्त हमारे यहां विभिन्न और विरोधी विचारधाराओ वाले राजनीतिक दल होंगे।  क्या भारतीय देश को अपने मताग्रहों से ऊपर समझेंगे ?  मैं नहीं जनता।  परन्तु परन्तु यह तय है कि यदि पार्टियां अपने  मताग्रहों को देश देश से ऊपर रखेंगी तो हमारी स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी और संभवतः वह हमेशा के लिए खो जाये।  हम सबको दृढ संकल्प के के साथ इससे बचना है।  हमें अपने खून की आखिरी बून्द तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी है  (तालियां ) ;
लोकतंत्र को वास्तव में  बनाये रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए ? मेरी समझ से , हमें पहला काम यह करना चाहिए कि अपने सामाजिक व आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लिए निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिय।  दूसरी चीज , हमें जॉन स्टुअर्ट मिल की चेतावनी को याद रखना होगा।  उन्होंने कहा था ,``अपनी स्वंत्रता को एक महानायक के चरणों में समर्पित न करें और न उस पर विश्वाश करके उसे इतनी शक्तियां दे कि वह संस्थाओं को नस्ट नष्ट करने में समर्थ हो जाये।
तीसरी  बात , हमें राजनितिक लोकतंत्र से ही संतुष्ट नहीं  होना चाहिए।  हमें इसे एक सामाजिक सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए।  जब तक यह नहीं होगा , राजनितिक लोकतंत्र चल नहीं सकता। सामाजिक लोकतंत्र ऐसी जीवन पद्धति है जो  स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करती है।  राजनीति में हम एक व्यक्ति , एक वोट के सिद्धांतों पर चल रहे होंगें जबकि हमारे आर्थिक व सामाजिक ढांचे में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को रहें होंगें।  जितनी जल्दी हो सके हमें इस असमानता को खत्म करना होगा। 
देश में राजनीति सत्ता कुछ लोगों लोगों का एकाधिकार रही है।  इसके कारण बहुजनों से न केवल विकास के अवसर छीन लिए हैं बल्कि उन्हें जीवन के रस से वंचित कर दिया है।  उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जितनी  जल्दी उपयुक्त स्थितियां बना दी जाएँ , देश के लिए , उसके  लोकतान्त्रिक ढांचे के लिए उतना ही अच्छा होगा।  हमें यह नहीं भूलना  चाहिए कि स्वतंत्रता ने हम पर बहुत बड़ी जिम्मेदारियां डाल दी हैं। अब कोई भी चीज गलत होने पर अंग्रजों को दोष देने का बहाना ख़त्म हो गया है।  दोष हमारा होगा।  हमसे गलतियां होने का खतरा बहुत बड़ा है।

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